Thursday, March 09, 2017

पुराने दोस्तों के संग बातें...

आज मैंने अपनी पुरानी डायरी
के कुछ पन्ने पलटे..
इनमें कुछ पुराने दोस्तो के नाम थे..
वे नाम जो वाट्सएप फेसबुक के जमाने से पहले
मेरे साथ हुआ करते थे...

इनमें से कुछ अब भी साथ हैं
तो कुछ वहीं पड़े हैं पुरानी डायरी के पन्नों में ही...

सोचा चलो चलकर मिलते हैं उनसे
फुरसत में
करेंगे ढेर सारी बातें

वे बातें
जिनका सिलसिला कभी नहीं रुकता

पुराने दोस्त कुछ ऐसे थे
जो फोन करके पूछते थे
नौकरी कैसी चल रही है...

और बेरोजगारी के दिनों में पूछा करते थे
पैसे खत्म हो गए क्या
कहो तो कुछ रुपये भिजवा दूं
जो मैंने अपनी पत्नी से छिपाकर 
अलग से जमा कर रखा है...
जब बन पड़े लौटा देना।

पुराने दोस्त मुझे सीखाते थे
महानगर में रहने का सलीका...

ये सीखाते थे कैसे बचाए जाए
बुरे वक्त के लिए दो पैसा। 
कहते थे बासमती का टुकड़ा चावल 
खरीदा करो... कुछ रुपये बचेंगे..

वे पुराने दोस्त कुछ ऐसे थे
जिनके कंधे पर सिर रखकर
देर तक रोने की इच्छा होती थी

आभासी दुनिया के
इन फेसबुकिया दोस्तों के बीच
पुराने दोस्त कहीं खो गए हैं...

चलो एक बार फिर ढूंढते हैं
पुरानी डायरी से
उनका नाम और पता..

तय करते हैं एक मुलाकात...
और फुटपाथ पर बैठकर
पीएंगे कटिंग चाय...
देर तक लड़ाएंगे गप्प..

और पूछेंगे एक दूसरे से
ये कहां आ गए हम....
यूं दूर- दूर चलते हुए....

-    विद्युत प्रकाश मौर्य  ( मार्च 2017 ) 

Thursday, June 04, 2015

मेरी मां

बातें उसकी माखन मिश्री
स्पर्श उसका चंदन है
जिंदगी तुझपे वार दूं
चरणों में तेरे वंदन है
मेरी पूजा मेरी मां.....

शाम का संगीत है
रात की वो लोरी है
नेह की नदिया है
दूध की कटोरी है
शहद सी मीठी मेरी मां.....

गरमी की शीतल छांव है
अमराई की वो गांव है
सरदी की सुनहरी धूप है
अनगिनत उसके रूप हैं।
अनूठी अलबेली मेरी मां।


-         ----  विद्युत प्रकाश मौर्य
-         08 मई 2013


Wednesday, August 10, 2011

कागज की नाव

  
बारिश में भींगते हुए



पानी के संग खेलते हुए

बनाई है मैंने देखो

कितनी प्यारी

कागज की नावें

तैरती हैं छोटे से सागर में

सात समंदर पार

ये जाएंगी

मेरे लिए कुछ

सौगात लेकर आएंगी

कल्पना की मंजिल


की राह में जाएंगी

अज्ञात प्रेमिका का

पता ढूंढ लाएंगी

प्रेरणा बनकर ये मेरा

साथ निभाएंगी

रखूंगा सहेज कर मैं इन्हें


ये मेरे भविष्य का

रास्ता दिखाएंगी...


(अगस्त 1985 )

जुल्फें

यूं न बिखराईए
इन जुल्फों को...

नादां दिल है
इन्ही में खोकर
रह जाएगा.....

मंजिल तो दूर है
रास्ता भी...

इन्ही वादियों में
सिमट कर रह जाएगा....

-
 विद्युत प्रकाश

( प्रकाशित -साहित्य संगम, 1989) 

अब खुशबू नहीं आती

सर्दी की सुबह की मीठी धूप को
कुहरे ने ढक लिया
कुछ पुराने रिश्ते
सह नहीं सके
तेज धूप का तीखापन

कि अब किसी के आने जाने से
खुशबू नहीं आती
चांदी के चंद ठीकरों
के मोह में
कुछ दोस्तों ने गिरवी रख दिया
स्वाभिमान...


दरिद्रता के दौर में जी रहे हैं वो
जो दावा करते थे
सूचना के सौदागर बनने का
जिन्होंने कहा था
वक्त पर काम आएंगे


पहली बरसात में ही
उनके घर की दीवारें रिस गईं
खिड़की और दरवाजे खुले थे
हवा आई और सारा घर
उड़ा कर ले गई...


फिर भी बची है आस्था
नींव के ईंटों में
कि एक दिन लौटकर आएगा
गुजरा जमाना....

-    विद्युत प्रकाश
-     


सपना अच्छे दिन का...

हर सुबह 

जब मैं उठता हूं
देखता हूं उस लाल सूरज को
संजोता हूं सपना
एक खूबसूरत दिन का
जब जाता हूं नाश्ते की टेबल पर
देखता हूं वहां
आज की ताजा खबर
ताजा की जगह
फिर वही होता है बासी
युद्ध और आतंकवाद के साए में
पलती विश्व की तस्वीर
कोई नहीं जाता
एवरेस्ट पर
हां कुछ बहुएं अवश्य
जलाई जाती हैं..
ये धार्मिक आंदोलन
वो विश्वबंधुत्व का सपना
हां थोड़ी शीतलता
विज्ञापन दे जाते हैं
दुनिया रंगीन और लुभावनी है
वे ये कह जाते हैं।
लेकिन फिर वही मनहूस खबरें
नहीं होने देतीं कभी अपना
मेरे खूबसूरत दिन का सपना।
-    विद्युत प्रकाश मौर्य  

मैंने कहा

मैंने कहा चेहरा

उसने समझा उदासी

मैंने कहा चांद

उसने समझा अमावस

मैंने कहा इंतजार

उसने समझा बेबसी

मैंने कहा श्रम

उसने समझा मजबूरी

मैंने कहा दर्द

उसने समझा रूदन

क्यों नहीं आई

चेहरे पर मुस्कान

चांद क्यों नहीं हुआ पूरनमासी

इंतजार में क्यों नहीं हुई

पाने की ललक

श्रम में क्यों नहीं हुई साधना

दर्द में क्यों नहीं आया

मीठेपन का एहसास?

-    विद्युत प्रकाश मौर्य
-     

बातें


कुछ ऐसे रिश्ते
रहने भी दो
जिनका कोई नाम न हो
एक जगह ऐसी छोड़ दो खाली
आशियाने में
जहां अनावृत कर सारे
बाह्रय आवरण
उतारकर सारी कृत्रिमता
संभव हो मानव का मानव से
उन्मुक्त मिलन
मिथ्या प्रवचनों
अंशकालिक अनुबंधों
के मध्य कर लो
कुछ ऐसी बातें
जो कभी खत्म न हो
बातें जो कभी खत्म न हो
-    विद्युत प्रकाश मौर्य

हशरतों का कारवां

हशरतों का कारवां

चल चुका है

तुम चलो या न चलो

पायल तुम्हारी बज उठेगी

सन्नाटे का सफर

शेष हुआ

ये आवाज का मौसम है

तुम बोलो या न बोलो

मेहंदी वाले हाथ

सच्चाई बयां कर ही देंगे

आए हो

एहसास की महफिल में

तुम गुनगुनाओ या चुप रहो

कजरारे नयनों की चितवन से

जमाना जान ही जाएगा

बहती रहो तुम

एक धार सुहानी सी

हम प्यासे भृंग

तुम्हारे करीब आ ही जाएंगे।


-    विद्युत प्रकाश मौर्य 

सोचता हूं बोल दूं

सोचता हूं बोल दूं
कि तुम मेरी हो
लेकिन तुम
अनुपम अनुकृति सृष्टि सर्जक की
सिर्फ मेरी और मेरी
कैसे हो सकती हो
तुम का मैं होजाना
और मिल जाना
आकंक्षाओं का आकंक्षाओं से
सपनों का सपनों से
कहीं मौत न हो जाए
कुछ बेहतर संभानाओं की
कुछ सोच सोच कर शब्द रूक जाते हैं
जीवन के मधुवन में
सुनहरे ख्वाबों के
एक नीड़ के निर्माण में
न जाने कितनी देरी हो
फिर फिर सोचता हूं बोल दूं
कि तुम मेरी हो..

-    विद्युत प्रकाश मौर्य

Sunday, October 10, 2010

कई सालों बाद



कई सालों बाद
दूर देश जा बसी प्रेयसी का

आया है लंबा सा खत


खत में है ढेर सारी


नन्ही नन्ही खुशियां


कुछ मोती कुछ सीप

लेकिन हम कहां रखे सहेज कर


ये खुशियां


हमारे पास नहीं है


इतनी लंबी चादर


कई सालों बाद


आई है सुहाने बचपन की याद


जब नौ दिन तक लगातार


हुई थी बरसात


खेतों ने ली थी
लंबे अंतराल बाद


सुख की एक लंबी अंगडाई.....


लेकिन अब इन कंक्रीट के जंगलों में


जीवन को खुल कर जीने की जगह


कहां बची..
हम बार बार अपनी


पुरानी प्रेयसी के खत


के लिफाफे को उलट पलट कर

देखते हैं लेकिन नहीं मिलता


एकांत जहां बैठकर


इस खत को बांचे.


और बहाएं ढेर सारे आंसू


कि सितम हमने खुद पर ही ढाए हैं

इतने सालों से

कि तुझे हम क्या देंगे


खत का जवाब

कई सालों बाद आया है


दूर देश जा बसी प्रेयसी का
लंबा सा खत....


- विद्युत प्रकाश मौर्य ।

Monday, September 13, 2010

कई सालों बाद

कई सालों बाद मेरे शहर में



जमकर बदरा बरसे हैं


कई सालों बाद


आसमान ने धरती के सीने पर


अपनी ढेर सारी रूमानियत उडेली है


कई सालों बाद


मानो युग युग से प्यासी


धरती की गोद हो गई है


हरी भरी


कई सालो बाद


विरह की आग में जलती स्त्री ने


लूटा है ढेर सारा


अपने प्रियतम का सुख।


कई सालों से सूखे


नदी नालों कुएं बावड़ियों में


दिखा है


यौवन का उफान


कई सालों से


जलधारा जा रही थी


नीचे और नीचे


पाताल की ओर


एक बार फिर उसे


आसमान का प्यार खींच लाया है


थोड़ा उपर...


निष्ठुर और बेदर्द लोगों के शहर में


हुई है प्रकृति की मेहरबानी


कई सालों बाद


लेकिन हम नहीं थे तैयार


आसमान का इतना प्यार को


सहेज को रख पाने के लिए


हमारे पास नहीं थे घड़े


इतनी रसधार को समेट पाने के लिए


हमारी दुनिया हो गई है


इतनी छोटी


कि हम नहीं बटोर पा रहे हैं


आसमां का इतना सारा प्यार


दुखी होकर हम कह रहे हैं


जाओ रे बदरा


कहीं दूर देश जाकर बरसो


की सालो बाद आसमां ने


उड़ेला है धरती पर ढेर सारा प्यार...


- विद्युत प्रकाश


- 13 सितंबर 2010 ( दिल्ली में कई सालों बाद जमकर हो रही बरसात पर )


Saturday, November 01, 2008

हरी हरी घास पर

चलो चलकर बैठेंगे
हरी हरी घास पर
सरदी की दोपहर की शरमाई सी
सुनहरी धूप के संग
खाएंगे गरम गरम जलेबी
और देखेंगे ढेर सारे
सपने................
बनाएंगे रेत के महल
क्या हुआ जो महल
अगले ही क्षण टूट-टूट कर
बिखर जाएगा
हम फिर बनाएंगे नया महल
भला हमें सपने देखने से
कौन रोक सकता है....
चलो चलकर बैठेंगे
हरी-हरी घास पर
और जी भर कर निकालेंगे
एक एक कर मन की सारी कुंठाएं
और खारिज करेंगे उन्हें
जो अपनी शान में खुद ही
कसीदे पढ़ने से नहीं अघाते
हरी हरी घास पर हम
भूल जाएंगे कि कल
कितना खराब गुजरा था
हम भूल जाएंगे कि
सितमगर ने कितने सितम
ढाए थे....
हम भूल जाएंगे कि
पिछली दीवाली की रात
कितनी काली थी...
बस याद रखेंगे कि
फूलझडियों की रोशनी के बीच
उसकी सूरत में कितनी
मासूमियत थी
चलो चलकर बैठेंगे
हरी हरी घास पर
और नक्सा निकालकर
ढूंढेगे कोई नया शहर
और नए मुलाकाती
क्योंकि इन मुलाकातों में ही
छीपी है...
भविष्य की कई नई
संभावनाएं...
और सुनहरे ख्वाबों की एक और
दुनिया....
चलो चलकर बैठेंगे
हरी-हरी घास पर ...
-विद्युत प्रकाश ( जनवरी 2003, जालंंधर में )

Friday, October 31, 2008

मेरे शहर में

लोग सरेआम लूट जाते हैं मेरे शहर में
पड़ोसी बेखबर सोते हैं मेरे शहर में

बीमार की खबर लेने कोई जाता नहीं
मौत पे मर्सिया गाते हैं मेरे शहर में

बेबस बाप का दर्द है कितना अनजाना
शादी की दावतें उड़ाते हैं मेरे शहर में

रोटी की तड़प से मर जाते हैं लोग यहां
स्कॉच पानी सी बहाते हैं मेरे शहर में

प्यार का अर्थ बदला-बदला सा है यहां
मुखौटे में चेहरा छुपाते हैं मेरे शहर में


अक्सर लोग रात में जख्म दे जाते हैं
दिन में हाल पूछने आते हैं मेरे शहर में

गमे रोजगार में वे मेरा हाथ थामे थे
आज वे हासिया बनाते हैं मेरे शहर में

- विद्युत प्रकाश, जून 1994